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Thakur


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मेरा मैनिफेस्टो!

Posted On: 14 Apr, 2014  
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जनरल डब्बा में

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कर्मयोगी की कद्र होनी चाहिए!

Posted On: 14 Apr, 2014  
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जनरल डब्बा में

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देश में ज़ुल्म कर रही चोर चौकड़ी

Posted On: 28 Jan, 2011  
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जनरल डब्बा में

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चीन की चमक ……आखिर राज क्या है?

Posted On: 22 Jan, 2011  
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जनरल डब्बा में

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दृष्टिकोण का फर्क |

Posted On: 8 Jan, 2011  
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जनरल डब्बा में

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मैं मूर्ख खल कामी …मैं कुमति ?????

Posted On: 25 Dec, 2010  
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जनरल डब्बा में

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THE DARK SIDE OF MANREGA

Posted On: 18 Oct, 2010  
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जनरल डब्बा में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपके लेख के संदर्भ में कुछ तथ्य और जोड़े चाहिये 1. हिस्से—पुर्जों की गुणवत्ता निम्न होने से क़ीमत और गिरेगी. 2. करोड़ों की मात्रा में उत्पादन/ख़रीद से इस क़ीमत का अंदाज़ा और लगाया जा सकता है. 3. कोई नहीं जानता कि चीन सरकार हर उत्पाद में कितनी सब्सिडी और देती है. 4. चीन सरकार के लिए सब्सिडी देना बाएं हाथ का खेल है क्योंकि कोई नहीं जानता कि वह सरकार रोज़ कितने नोट छाप रही है. 5. चीनी मुद्रा का वास्तविक मूल्य क्या है, इसी कारण कोई नहीं जानता. 6. 1991 तक सोवियत रूस भी विकसित देश माना जाता था पर विघटन पर इसका भांडा फूटा तो पता चला कि जो एक रूबल वो हमें एक रूपये के बदले देते चले आ रहे थे वे एक रूपये में 50 मिलने लगे थे जबकि एक डालर में तब 33 रूपये आते थे. 7. यही सब चीन के साथ भी है... इंतज़ार करिये...

के द्वारा:

गुरुदेव आपके विचार सत्य हैं | इनमें से आधे से ज्यादा ऐसे भी थे जो मय से मकसद खुमारे इश्के इलाही बयाँ करते हैं और हम दूसर नशे की बात समझ लेते हैं | असल में असली शराब की कद्र तो ग़ालिब जी ही फरमाते थे | ध्यान में डूबने के नशे को नानक जी ने "नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात " कह कर छका और छकाया | शराब क्या दुनिया में कोई भी ऐसी चीज नहीं हो सकती जिसे मालिक नें बेकार बनाया हो परन्तु उसके सेवन की सीमा का ज्ञान होना जरूरी है और साथ ही उसका असली होना भी जरूरी है | आजकल शराब की खपत इतनी ज्यादा हो चुकी है के सही ढंग से brew करके अगर बनानी हो तो पूरी भी नहीं होगी और महंगी भी पड़ेगी | इस लिए निर्माता लोग नशीले पदार्थ डालकर रातों रात महीने भर का कोटा बनाने की क्षमता रखते हैं | Brewed and distilled pure शराब, जिसकी सीमित मात्रा सेहत के लिए अच्छी होती है , अब बहुत महंगी है और गारंटी भी नहीं है | इस लिए मैं नहीं पीता और भाई लोगों से भी निवेदन करूंगा के परख करके ही पीना | धन्यावाद |

के द्वारा: Thakur Thakur

पीना कोई खराब बात भी नहीं है। उर्दू की काव्‍य -गंगा तो ज्‍यादातर पीना- पिलाने, शाकी-शराब, मय-मयखोरी,पैमाना-सागर,इश्‍क,आशिक और माशूक पर ही केन्द्रित है।लोक से लेकर परलोक तक सब को इसी से छूती है। पीने- पिलाने का बडा महिमा मंडन किया गया है। खाहिश देखिए-  या इलाही सागर को मैखाना कर दे, मैं पियूं और लोग पियें मेरे मर जाने के बाद। ऐसा विश्‍व बंधुत्‍व और परम कल्‍याणकारी भाव अन्‍यत्र कहां मिलेगा । दो लाइनें तो सभी को पीने वाला बताती हैं-  कौन कहता है मैं नहीं पीता , कौन झूठी कसम उठाता है                        मय कदे से जो बच निकला है , तेरी आंखों की मय पीता है।  कहां तक लिखा जाए। अमित कथा विस्‍तार......।

के द्वारा:

 भाई साहब, पहली और खास बात तो यह है कि लेखन को नियमित करें। आप के पास बहुउपयोगी ज्ञान सम्‍पदा है और इसके साथ भी '' दोऊ हाथ उलीचिये जो घर बाढै दाम'' की बात लागू होती है। चलती चाकी देख के दिया कबीर रोये | दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए ||  मेरे ख्‍याल से प्रात: स्‍मरणीय कबीर दास जी इसके माघ्‍यम से मनुष्‍य की लघु सीमा, संसार की नश्‍वरता और रामायण के ' ईश भजन सारथी सुजाना' के सत्‍य का संदेश देना चाहते थे। मृत्‍यु और बुढापा दो सशक्‍त दुशमनों से जीव को अकेले मुकाबला करना है। इन से कोई नहीं बच पाता । बुढापे से बचा तो मौत पहले दबोच लेती है और मौत पिछड गयी तो  ओर फिर न जाने वाला बुढापा घेर लेता है। पीछे से मौत आती है। उसी का जीवन सार्थक होता है जो भगवान भरोसे हो जाता है।   दो पेग लगा कर इतना अच्‍छा लिख सकते हैं तो बिना लगाये तो और कमाल हो सकता है। मैं तो शराब-सिगरेट की अंतिम सीमा को छूकर खुदा के फजल से इनसे पूरी तरह निवृत्‍त होकर लौट के बुद्धू घर को आए वाली स्थिति में आ चुका हूं।

के द्वारा:

बिलकुल ठीख लिखा वाजपेयी जी आपने, सत्य क्या है यह आप भी जानते है ठाकुर जी भी और मैं भी क्योंकि हम एक ही मंजिल के राही है जिस तरह एक पतंगा लो पर आकर दम तोड़ देता है और ज्ञान को प्राप्त करता है हमारा जीवन भी वही है बस जो रास्ता पतंगे को लों तक आने में तय करना होता है उतनी ही दुरी का कष्ट होता है कभी कभी उसको शंका होती है इसलिए लों के चारो तरफ चक्कर काटता अंत में निष्कर्ष वही निकलता है की लों ही उसका अंतिम पड़ाव है उसके बाद तो सब कुछ अन्नत ही है कभी कभी धूप (ज्ञान ) के चश्में पर धूल पड़ जाती है जिसको हम यदा कदा कपडे से साफ कर लेते है हम तीनो भी शायद वही कर रहे है जिससे आगे का सफ़र तय कर सके ! आशुतोष दा

के द्वारा:

  आपकी बात बिलकुल सही है आशुतोष दा जी। बस इसमें एक निवेदन करना चाहता हूं। आपके पास जाने के लिए तो तय रास्‍ता पूरा करना ही पडेगा, लेकिन 'उस मंजिल' के पथिक के लिए सारे रास्‍ते, अनंत रास्‍ते हैं। कोई एक तय रास्‍ता नहीं है। सही बात तो यह है कि हर किसी को अपने रास्‍ते से यात्रा तय करनी होती। तय रास्‍ते या महा पुरुषों द्वारा निर्दिष्‍ट रास्‍ते केवल सहायक हो सकते हैं। मंजिल तक पहुंचने को भगवान ने हर एक को सुलभ रास्‍ता दिया है। चूंकि वह कहीं बाहर तो है नहीं जिसके लिए जाना पडे। वह तो हम में ब्‍याप्‍त है और हम उसमें ब्‍याप्‍त हैं। ' दिल में छिपा रखी है तरूवीर यार की , जब जरा गर्दन झुकाई देख ली।  ' मो को कहां ढूंढै रे बंदे मैं तो तेरे पास में।'

के द्वारा:

 भाई साहब,   \'\'क्योंकि इसमें और भी ऐसी भावनाएं हैं जो कर्म योगी को शोभा नहीं देती भिखारी को शोभा देती है |\'\'   और     \'\'और महत्मा बुध का भीख मांगना भी असल में कर्मयोग ही है क्योंकि उन्हें श्रष्टा ने जिस निमित्त के लिए चुना था उस में यह जरूरी था |\'\' आपके उपर्युक्‍त दो वाक्‍य समाधान भी लिये हैं। भगवान \'बुद्ध का भीख मांगना भी असल में कर्मयोग ही है\'  तो भिखारी भी तो कर्मयोग ही करता है। दंभ यहां कदाचित उपयुक्‍त शब्‍द न हो या अतिरेकी हो,  कृपया इसको सामान्‍य भाव से लें। मुझे कोई विनम्र शब्‍द सूझा नहीं और भिखारी वाली बात से \'दंभ\' उसके समीप लगा इस लिए लिख दिया। आप दंभ करते हैं, ऐसा कहने की न मैं ध्रष्‍टता कर सकता हूं  और न मेरा आशय था।  कर्म तो सभी करते हैं या सभी से कर्म होते लगते हैं, लेकिन योग जुड जाने पर होता है। जब अविछिन्‍न रूप से तार जुड गए तो किया जाने वाला या होते जाने वाला कर्म कर्मयोग हो जाता है। योगयुक्‍त कर्म बांधने वाला नहीं होता और योग रहित कर्म फल चखाने वाले होने से 84लाख योनियों के \'पुनरपि  जन्‍मं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्\'  के चक्र में घुमाने वाला होता है। गीता और भगवान आद्य शंकराचार्य दोनों ऐसा कहते हैं।  विचार करें तो पाते हैं कि कर्म का कर्ता जीव होता ही नहीं । जब जितनी चाभी भरी राम ने उतना चले खिलौना है और खिलौना बनाने वाला तथा उसमें कर्म-गति की चाभी भरनेवाला सब कुछ वही \'नट\' है तो हम कर्म कर्ता कैसे हो गए?  हाथ से कोई काम किया कर्ता कौन हुआ - वह हाथ, पूरा शरीर या इसमें ब्‍याप्‍त प्राण या फिर इन सब का सर्जक-दृष्‍टा ? सूर्य जीवन ऊर्जा देता है, पृथ्‍वी घूमती दिन रात होते हैं, बारिश होती है, सूखा, बाढ होते हैं , हम तो इनके सापेक्ष हैं , स्‍वतंत्र कहां ? गुण ही गुणों में वर्तते हैं , यह गीता कहती है। कभी रात के सन्‍नाटे में एकांत अकेले छत पर जा विचार करिएगा । दिखेगा कहीं आमोद-प्रमोद के कहकहे होंगे, कहीं कोई जन्‍म ले रहा होगा , कोई अंतिम सांसे गिन रहा होगा, कहीं उकैती , बलात्‍कार , अपहरण हो रहे होंगे, कहीं कहीं युद्ध की विभीषिका होगी , कहीं शरणार्थ्‍ी ,शिविरों में खाने पीने और नित्‍य क्रिया तक को तरसते लोग होंगे।  वनों में अगल दुनिया होगी, समुद्र अलग कर्म हो रहे होंगे। एक साथ अनंत कर्म । महा प्रकृति के कर्म। हम अपनी विवशता को कभी कभी कर्म करना मान लेते हैं। स्‍मरण भी हम करते , वही महा नट कराता है। जिन्‍हें नहीं कराता वे नहीं कर पाते। क्‍यों कि स्‍मरण किसका और क्‍यों ।जिसको हमने देखा-जाना हो ,जिसका सान्निध्‍य मिला हो या मिल रहा हो उसी का तो स्‍मरण करेंगे। जिसे हम ठीक से जानते नहीं, उसकी याद कैसेट करेंगे।  अंत में फिर यही लगता है कि उद्यम, कर्म, पौरुष से हम उसे नहीं पा सकते, उसकी कृपा से ही वह प्राइज़ है। ऐसे में समर्पण-शरणागति ही एक मात्र सुगम विकल्‍प बचता है। और शरणागति के लिए मैं मूरख कुमती ... की प्रार्थना एक अच्‍छा साधन है। इस भव बोध का हृदय दीप जल गया तो आघ्‍यात्मिक उन्‍नति , आगे की कक्षाओं की यात्रा स्‍वयमेव होती जाएगी।  सोई जानइ जेहि देहु जनाई, जानत तुम्‍हहिं तुमहिं होइ जाई।  तुम्‍हरी कृपा तुम्‍हहिं रघु नंदन, पावहिं भगत भगत उर चंदन।  आपसे और आशुतोष दा जी सत्‍संग चर्चा के लोभ से ही यह उल्‍टा -सीधा लिख दियह है। वैसे हूं आप सब से बहुत पीछे।

के द्वारा:

आदरनिये वाजपेयी जी और ठाकुर जी नमस्कार मुझे लगता है की ठाकुर जी आप इन प्रार्थनाओं से ऊपर उठ चुके है और इश्वरिये ज्ञान के करीब है! कभी कभी जब हम मंजिल के काफी करीब होते है तो हमें रस्ते में पड़े लोग और लोगो के क्रिया कलाप निरर्थक लगते है हलाकि हम भी उसी रस्ते पर चल कर आये होते है जैसे ज्ञान मिल जाने पर ज्ञान की प्राप्ति में लगे लोगो का प्रयास निरर्थक लगता है ! लेकिन ठाकुर जी जीवन मरण की मृग मरीचिका में ईस्वर ही सर्वोपरि है और उसके आगे हम मनुष्य ! और इन प्रार्थनाओं से हम कहीं भी निम्न्ताओं को नहीं प्राप्त करते बल्कि परमपिता का गुणगान ही करते है ! और परमपिता का गुणगान करना मेरी नजर में बुरा नहीं है ! गुरु से ज्यादा ज्ञान अर्जित करने के बाद भी गुरु गुरु ही रहता है ! ज्ञान अंदर से ही आता है लेकिन इस तथ्य का ज्ञान होना भी अवश्य है आप को अगर मेरे पास आना है तो तय रास्ता तो पूरा करना ही पड़ेगा ! अतः जो ये प्रार्थनाये करते है वे लोग मार्ग में है और आप मंजिल के करीब लोगो में! तो उनको आप मंजिल प्राप्त करने के लिए तय रास्ता पूरा करने दीजिये उनके क्रिया कलापों पर उंगलियाँ मत उठाएं ! शायद आप मेरी बात समझ सके ठाकुर जी आप दोनों की ही प्रतिक्रिया के प्रतीक्षा में आशुतोष दा

के द्वारा:

परम आदरनीय बाजपाई जी ! प्रणाम | आपने तो मेरी गति अर्जुन जैसी कर दी "व्यामिश्रेण वाक्येन बुद्धी मोहयसीव में" | मैं भी यही निवेदन कर रहा हूँ कि एक ही जगह पर एडियाँ रगड़ते रहने या घिसे रिकार्ड कि तरह एक ही लाइन पर आजीवन अटके रहना अच्छा नहीं | और आगे, और ऊंचा उठे एक हो जाएँ फिर काहे की प्रार्थना, किसकी प्रार्थना ? ऐसा कर सके तो अच्छा है | ज्ञान के बारे में मुझे मौलाना वहीदुद्दीन खान साहिब के तीन अलफ़ाज़ कभी नहीं भूलते 'ला-इदरी निस्ब उल-लिल" मुझे अब ये पता चल चुका है कि ब्रह्मांड में जितना कुछ जानने को है वो मैं कभी नहीं जान पाउँगा | इस लिए बड़ी बड़ी पोथियाँ पढना छोड़कर अनासक्त भाव से उस कर्म में रत रहूँ जिस निमित्त के लिए उसने रचा है और हमेशा उसे याद रखूं जिसने मुझे रचा है येही मेरी प्रार्थना पद्धति है | मेरी शंकाएं कम करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद | प्रीतम |

के द्वारा: Thakur Thakur

परम आदरनीय बाजपाई जी ! आपके तर्क अकाट्य नहीं अपितु उनके विपरीत जाना मुझे अपनी ढिठाई लगेगी | फिर भी एक निवेदन है कि कर्म योग दंभ नहीं अपितु इश्वर या परमेश्वर या supreme consciousness की आज्ञापालन मात्र है | यह मैं नें कहीं पढ़ा नहीं स्वयं अनुभव किया है | जगत नियंता ने जिस हेतु हमारी रचना की है वह करना दंभ नहीं | हाँ कर्ता भाव से युक्त होकर सोचना और करना दंभ हो सकता है परन्तु निमित्त भाव से करते रहना और स्मरण भी करते रहना दंभ से बचाता है | ये मेरा अपना मत है | और महत्मा बुध का भीख मांगना भी असल में कर्मयोग ही है क्योंकि उन्हें श्रष्टा ने जिस निमित्त के लिए चुना था उस में यह जरूरी था | आपके सारगर्भित विचार के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

के द्वारा: Thakur Thakur

 आदरणीय श्री प्रीतम सिंह जी,  अध्‍यात्‍म -भक्ति बिषयक कोई संशय बचकाना नहीं होते । वहां या तो मंजिल पा चुका, जान चुका होता है जिसके लिए कुछ जानने या करने- न करने को शेष नहीं रहता या फिर हम आप जैसे साधन-द्वार पर खडे। जब तक सत्‍य पूर्णत: प्रतिभाषित नहीं हो जाता  तब तक हम आप सभी \'\' जानने\'\' के मामले में एक जैसे ही हैं। किसी मामले-बिंदु के बारे में किसी का नजरिया अपेक्षाकृत अधिक स्‍पष्‍ट हो सकता है, किसी पर दूसरे का।  जीव, जगत, ईश्‍वर या माया, ज्ञान-अज्ञान का प्रपंची खेल शास्‍वत है। जीव की जो स्थिति- हैसियत हजारों साल पहले थी, आज भी वही है। इस मायावी वन से पार पाने के रास्‍ते भी वही पुराने-शास्‍वत हैं। ज्ञान योग, कर्मयोग , भक्तियोग। हर साधना पद्धति -दर्शन में किंचित शब्‍द-रूप भिन्‍नता के साथ यही रास्‍ते हैं। अलग अलग लगने वाले ये सभी मार्ग -पद्धतियां एक ही साध्‍य-मंजिल तक जाते हैं और  तत्‍वत: एक ही हैं। ज्ञान प्रकाश होने पर अहंकार स्‍वयमेव विगलित हो जाता है। भक्ति में पूर्ण समपर्ण की प्रधानता होती है। अहं के रहते समपर्ण संभव नहीं होता। अहं अज्ञान है और द्वंद्व का जनक है। अहंकार समेटा नहीं जाता। इसे समेट पाना हमारे सामर्थ्‍य में भी नहीं होता। इसे अर्पण करना होता  है। दर अस्‍ल साधक के पास एक मात्र यही अर्पण करने को होता है। बाकी वह भगवान को क्‍या दे सकता है। विनम्र भाव बनाने की बात भी नहीं होती। आप पूरी ऐंठ-अकड के साथ भगवान से जुड सकते हैं। ध्‍यान रहे यह अकड केवल भगवान से होनी चाहिए, अन्‍य किसी से नहीं। अहं अर्पण की अंत: चेतना जाग्रत होने पर काम बन जाता है। अहंकार भगवान को दे दिया तो फिर प्रार्थना को कुछ बचता ही नहीं। द्वैत- द्वंद खत्‍म। एक हो गए तो कैसी प्रार्थना और किसके लिए प्रार्थना। सब झंझट ही खत्‍म। यह बुलबुले का सागर में मिल जाना होता है। कुद करने या जानने को नहीं रह जाता। केजी वगैरह की पढाई में हम ऐसा नही पढ पाते जिसमें कुछ पढने को न रह जाए। किसी एक बिषय का विशेषज्ञ भी उसे बिषय की जानकारी के एक सीमित दायरे तक ही पहुंच पाता है। यह प्रार्थना ग्रहस्‍थ या प्रारंभिक साधक के लिए है। अपने दोषदर्शन के पडाव पर पहुंच जाने के बाद सीधे संवाद हा स्थिति आ जाती है और ये दोष- विकार छूट जाते हैं। इस लिए यह प्रार्थना जडता नहीं , गति का महत्‍वपूर्ण माध्‍यम है।

के द्वारा:

आदरनीय बाजपाई जी ! सादर प्रणाम | मेरे बचकाना संशय का समाधान करके आपने मुझ पर निश्चय ही कृपा की है | इस तरह स्नेहसिक्त प्रतिक्रिया से आपने जो ज्ञानवर्धक जानकारी दी उस के लिए कोटिश: धन्यवाद | शायद मैं अपनी शंका सही तौर पर व्यक्त ही न कर पाया | परन्तु आपने उसका भी समाधान कर डाला | मेरा आशय भी यही था के सदियों तक एक ही सोपान पर अड़े रहना प्रगति का द्योतक है या जड़त्व का ? ये सही है के अपने अहंकार को समेटने हेतु विनीत भाव अपनाया जाये | परन्तु अध्यात्म में भी उसी परकार अगले सोपान पर पहुँचने का पर्यत्न करना ठीक रहेगा जैसे academic या तकनीकी सिख्षा का ऊँचे से ऊँचा स्तर या सोपान पाने का | अगर सारी उमर KG या ऐसी ही किसी एक ही कख्षा में बीत जाये तो उन्नति कैसे होगी ? इसी परकार , माफ़ करना मेरे विचार में, spirituality में भी दो दूनी चार का पहाडा पीछे छोड़ कर उच्त्तम की ओर अगर्सर होना अच्छा रहेगा | आपके जितना ज्ञान नहीं है, इसीलिए शंका लेकर उपस्थित हूँ | समाधान के लिए धन्यवाद | Preetam

के द्वारा: Thakur Thakur

 मनो विज्ञान या पदार्थ विज्ञान समेत कोई अन्‍य विज्ञान मन- बुद्धि आधारित होने से एक सीमित दूरी तक ही देख पाते हैं और इस तरह  सत्‍य के एक सीमित दायरे को ही उद्घाटित कर पाते हैं। जितना कहते- बताते हैं उससे कहीं अधिक अनकहा रह जाता है। अध्‍यात्‍म विज्ञान परम विज्ञान या विशुद्ध विज्ञान है जो मन-बुद्धि के साथ ही हृदय-भाव आधारित भी होने से सत्‍य को समग्रता से अनुभूत करने में सक्षम होता है।  मनो विज्ञान वैकल्पिक चिकित्‍सा का कुछ मामलों में माध्‍यम बन उपचारित कर सकता है , लेकिन \'मैं ही ईश्‍वर हूं\' सुबह-शाम रटते रहने से भी किसी को ईश्‍वरमय नहीं बना सकता। अहं ब्रह्मासि या पूर्णमिदं पूर्ण....... वगैरह संध्‍या-प्रार्थनायें नहीं मंत्र दृष्‍टा ऋषियों का अनुभूत तत्‍व दर्शन था। ऐसा अनुभव साधना के एक सोपान पर पहुंचने पर ही संभव है। अध्‍यात्‍म-साधन मानसिक एकाग्रता को अंगीकार करती है, आत्‍म सम्‍मोहन को नहीं । ध्‍यान देने योग्‍य है कि ध्‍यान-एकाग्रता और आत्‍म सम्‍मोहन दोनों बिल्‍कुल अलग अलग हैं।  \'\' मैं मूरख ,खल कामी.....कुमती....\'\' भक्‍त का अपनी कमियों-दुर्बलता को स्‍वीकार (ईसाइयत में भी confession का बडा महत्‍व है) करते हुए परमेश्‍वर के समक्ष अकिंचन भाव से सम्‍पूर्ण समपर्ण की प्रार्थना है। अगर परमात्‍मा को लक्ष्‍य कर ऐसी प्रार्थना करते हैं तो खल ,कामी नहीं बनेंगे, प्रत्‍युत उन विकारों से दूर होंगे। रामायण का एक प्रसंग इस संदर्भ में दृष्‍टव्‍य है। साधक सुग्रीव राजपाट पाकर बिष्‍ाय भेगों में अनुरक्‍त हो जाते हें और प्रभु स्‍मरण- राम कार्य भूल जाते हैं। लक्ष्‍मण द्वारा झटका लगने से जगने पर उन्‍हें इन मानवीय कमजोरियों का एहसास होता है। वह कातर प्रार्थना में कह उठते हैं- बिषय बस्‍य सुर नर मुनि स्‍वामी , मैं पांवर पशु अति कामी। अति काम पशुत्‍व है। इस स्‍वीकार-प्रार्थना के बाद ही वह कह पाते हैं- सुख सम्‍पति परिवार बडाई , सब तजि करिहउं तव सेवकाई। दोष-दर्शन के बिना नि:शेष समपर्ण नहीं हो पाता। आपकी प्रश्‍नगत प्रर्थना की पंक्ति में अध्‍यात्‍म साधना का मनो विज्ञान सूत्रबद्ध है।

के द्वारा: